Thursday, 18 November 2010

जागरण की घोटाला ख़बरें

बोले मनमोहन, बख्शे नहींजाएंगे दोषी
नई दिल्ली 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष की तरफ से उठाए गए सवालों पर प्रधानमंत्री ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी। निष्कि्रयता और चुप्पी जैसी दो बड़ी तोहमतों से जूझ रहे मनमोहन ने एक कार्यक्रम में दो टूक कहा कि इस मामले में कोई भी दोषी बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने विपक्ष से कहा कि वह संसद चलने दें, सरकार जवाब देगी और किसी चर्चा से नहीं घबराती। उसी कार्यक्रम में विपक्ष की तरफ से राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री को तत्काल जवाब दिया। जेटली ने कहा कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल नहीं है, असल मुद्दा घोटालेबाजों के खिलाफ कार्रवाई में निष्कि्रयता का है। एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में बेहद आशावादी उद्बोधन के बाद प्रधानमंत्री ने 2 जी से जुड़े सवालों पर अपना मुंह पहली बार खोला। उन्होंने कहा कि किसी के मन में जरा भी संदेह नहीं होना चाहिए। अगर किसी ने कुछ भी गलत किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि 2 जी मामले में विभिन्न जांच एजेंसियां काम कर रही हैं। विपक्ष को नसीहत ताकीद करते हुए मनमोहन ने कहा कि जांच जारी है, इसे आगे बढ़ाने के लिए लोकतंत्र में संसद का काम चलता रहना चाहिए। हम किसी भी मसले पर चर्चा के लिए तैयार हैं। चर्चा से हम घबराते नहीं हैं। सभी मामलों पर चर्चा करेंगे। उन्होंने इस मौके पर सभी विपक्षी दलों से संसद चलने देने की अपील भी की और कहा कि विधेयकों, कानूनों और विभिन्न विभागों की अनुदान मांग को पूरा करने के लिए संसद का नियमित रूप से चलना जरूरी है। इससे पहले अपने उद्बोधन के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि वह कतई दबाव में नहीं हैं। मौजूदा समय को कठिन बताए जाने की बात पर मनमोहन ने कहा कि भारत में हम हमेशा कठिन दौर में ही जीते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में कई बार मुझे लगता है कि मैं हाईस्कूल का छात्र हूं, जो एक परीक्षा से दूसरी परीक्षा दे रहा है। जाहिर तौर पर प्रधानमंत्री का यह सबको जवाब था कि यह ऐसा दबाव उनके ऊपर पहली बार नहीं आया है। प्रधानमंत्री के बाद इसी कार्यक्रम में राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने उनको जवाब दिया। जेटली ने कहा कि प्रधानमंत्री को कोई बेइमान नहीं कह रहा। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई में उनका ट्रैक रिकार्ड बहुत खराब है। इस मौके पर वह मनमोहन को बेबस और कमजोर बताने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की प्रशंसा करने वालों की तुलना में उनसे सहानुभूति जताने वाले ज्यादा हैं। यह एक धारणा है कि वह कुछ कर नहीं पाते। प्रधानमंत्री के संसद चलने की अपील पर उन्होंने कहा कि गतिरोध भी संसदीय राजनीति का एक रूप है। सरकार बहस करे और भूल जाए, फिर कैसे विपक्ष चुप रहे। 2 जी मामले में जुलाई 2009 में राज्यसभा में तीन दिन बहस हुई, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई। इसलिए सरकार को जेपीसी की मांग माननी चाहिए। माकपा की वृंदा करात ने भी जेटली के सुर में सुर मिलाया और कहा कि संसद चलाने की जिम्मेदारी सरकार की भी है। उसे विपक्ष की संयुक्त संसदीय दल की मांग माननी चाहिए।


कई मायनों में खास है पीएमओ का हलफनामा
नई दिल्ली प्रधानमंत्री की निष्कि्रयता और चुप्पी को लेकर कठघरे में खड़े प्रधानमंत्री कार्यालय ने हलफनामे की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट में जो सफाई पेश की उसका अंदाज भी कुछ खास है। इस हलफनामे की शुरुआत होती है स्वयं को तथ्यात्मक पहलुओं तक सीमित रखने की घोषणा से और अंत होता है एक पृष्ठ के सत्यापन से। ये दोनों ही चीजें हलफनामे को अदालत में दाखिल होने वाले सामान्य हलफनामों से अलग करती हैं। प्रधानमंत्री की ओर से पीएमओ की निदेशक विद्यावती ने जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें कुछ ज्यादा ही सावधानियां बरती गईं हैं ताकि अदालत के घेरे में आया पीएमओ लिखित जवाब के साथ किसी और पचड़े में न फंस जाए। हलफनामे के पहले पैराग्राफ की आखिरी लाइन में विद्यावती ने कहा है कि उन्हें इस हलफनामे में सिर्फ तथ्यात्मक स्थिति तक सीमित रहने की सलाह दी गई है। इस तरह की बात सामान्यता अदालत में दाखिल होने वाले हलफनामों में नहीं कही जाती है। हलफनामा दाखिल करने का सबसे प्रमुख नियम है कि व्यक्ति को उसमें दी गई बातों की सच्चाई की जिम्मेदारी लेनी होती है, क्योंकि अगर हलफनामे में दिया गया कोई तथ्य गलत निकलता है तो हलफनामा देने वाला व्यक्ति अदालत में झूठी जानकारी देने का जिम्मेदार माना जाता है। ऐसा करने पर उसे दण्डित किया जा सकता है। विद्यावती ने 24 पैराग्राफ के इस हलफनामे के सत्यापन में कहा है कि पहला पैराग्राफ मेरी निजी जानकारी में सही है। दूसरा तीसरा और चौथा पैराग्राफ रिकार्ड पर आधारित है जबकि चौथे पैराग्राफ में सचिव शब्द से लेकर अंत तक के तथ्य मेरी निजी जानकारी में सही हैं। इसी तरह अन्य पैराग्राफ में दी गई जानकारी की हर लाइन का सत्यापन किया गया है यहां तक कि शब्दों का भी।

शपथपत्र में सुस्ती के सबूत
नई दिल्ली 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा पर अभियोजन की मंजूरी का मामला पहले छह माह प्रधानमंत्री कार्यालय में फंसा रहा और बाद के आठ महीने कानून मंत्रालय में लटका रहा। यह निष्कर्ष है उस हलफनामे का जो पीएमओ की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। हालांकि इस मामले में आई हर शिकायत पर की गई कार्रवाई का बिंदुवार ब्यौरा पेश कर निष्कि्रयता और चुप्पी के आरोपों को खारिज करने की कोशिश की। अब निगाहें इस पर होंगी कि मंगलवार को शीर्ष अदालत पीएमओ की सफाई पर क्या रुख अपनाती है? शनिवार को पीएमओ की निदेशक वी. विद्यावती की तरफ से दाखिल हलफनामे में याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी एवं अन्य की हर शिकायत पर पीएमओ की कार्रवाई का तिथिवार ब्यौरा दिया गया। विद्यावती ने यह साफ किया कि हलफनामा सिर्फ तथ्यों को सामने ला रहा है। हलफनामे के मुताबिक स्वामी की याचिका पीएमओ को 29 नवंबर 2008 को मिली, जिस पर दो दिन बाद ही पीएम ने संज्ञान ले लिया। पीएमओ ने स्वामी के पत्र पर दूरसंचार विभाग से जानकारी मांगी जिसका जवाब देने में विभाग ने दो माह लगाए। इस बीच पीएमओ को राजा के खिलाफ दो सांसदों की ओर से और शिकायती पत्र मिले। इन पर भी दूरसंचार विभाग से जानकारी मांगी गई। 19 फरवरी 2009 को लॅा फोकस संस्था के वकील अनिल गोपाल वारिअथ ने राजा पर मुकदमा चलाने के लिए राष्ट्रपति को शिकायत भेजी। उसे राष्ट्रपति कार्यालय ने पीएमओ भेज दिया। अब मामला कानूनी राय पर अटका। तीन माह फाइल पीएमओ के अफसरों के बीच घूमती रही और 29 मई 2009 को मंजूरी का मसला राय के लिए कानून मंत्रालय भेजा गया। उसने 10 दिन बाद बताया कि इस बाबत दूरसंचार मंत्रालय से जानकारी मांगी गई है। कानून मंत्रालय की राय का इंतजार होने तक स्वामी के मामले की जांच पीएमओ के संबंधित विभाग से करने की राय बनी। 23 व 31 अक्टूबर 2009 को स्वामी के दो पत्र और मिले। इनमें मंजूरी अर्जी के अलावा सीबीआई छापे, जांच और प्राथमिकी दर्ज होने का जिक्र किया गया था। यह भी कहा गया था कि अगर 15 नवंबर तक मंजूरी नही मिली तो वे अदालत में चले जाएंगे। दोनों पत्रों पर पीएमने चर्चा की और कानून मंत्रालय से राय लेने को कहा। 18 नवंबर को जब ये दोनों पत्र राय के लिए कानून मंत्रालय भेजे गए तो उसी समय मंत्रालय को साढ़े पांच महीने पहले भेजे गए वरिअथ से जुड़े पत्र की भी याद दिलाई गई। रिमाइंडर के साढ़े तीन माह बाद 8 फरवरी 2010 को पीएमओ को कानून मंत्रालय से राय मिली। इसमें कहा गया कि स्वामी अपने आरोपों को मजबूत करने के लिए सीबीआई जांच पर भरोसा कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो उनसे कहा जा सकता है कि सीबीआई व अन्य सक्षम प्राधिकरण द्वारा जुटाए गए सबूत देखने के बाद ही मंजूरी का मसला तय होगा। कानून मंत्रालय के सहायक विधि सलाहकार की ओर से आई इस राय को 26 जनवरी 2010 को कानून मंत्री ने भी पास किया। जब पीएमओ ने कानून मंत्रालय से स्वामी को जवाब भेजने का अनुरोध किया तो उसने मना कर दिया और कहा कि वह सिर्फ सलाहकार प्रकोष्ठ है। जवाब कार्मिक विभाग को देना चाहिए। तब पीएमओ में चर्चा के बाद 19 मार्च को कार्मिक विभाग ने स्वामी को जवाब भेजा। इस बीच पीएमओ को स्वामी के कई पत्र प्राप्त हुए। हलफनामे में इनका ब्योरा दिया गया है।

कंपनियों को बचाने के मूड में सरकार
नई दिल्ली 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर विपक्ष और सुप्रीमकोर्ट के निशाने पर चल रही केंद्र सरकार अब पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के घोटालों के बचाव में उतर आई है। राजा की कृपा से 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों के लाइसेंस रद करने की दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) की सिफारिश पर सरकार के रुख को देखकर लगता है कि वह फिलहाल इन कंपनियों के लाइसेंस रद करने के मूड में नहीं है। तभी तो उसने सीधे इन कंपनियों के लाइसेंस रद करने के बजाय इनसे हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इसके लिए राजस्व हानि का आकलन शुरू कर दिया गया है। इसके पूरा होते ही कंपनियों से भरपाई का तरीका निकाला जाएगा। संचार मंत्रालय के कानूनी सलाहकारों ने टीआरएआई की रिपोर्टो का आकलन शुरू दिया है। जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे साफ होता है कि लाइसेंस रद करना सरकार का अंतिम विकल्प होगा। इसकी वजहें बताई जा रही हैं। पहली, टीआरएआई ने कारोबार शुरू करने में देरी की वजह से लाइसेंस रद करने की बात कही है, घोटालों में संलिप्तता की वजह से नहीं। दूसरी, राजा से पहले भी इस नीति के आधार पर लाइसेंस दिए गए हैं। तीसरी, अधिकांश कंपनियों ने व्यापक नेटवर्क तैयार करने की शुरुआत की है और भारी-भरकम विदेशी निवेश हुआ है। और चौथी, कई कंपनियों के ग्राहकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है ऐसे में यदि लाइसेंस रद किया गया तो ग्राहक हित प्रभावित होगा। सूत्रों के मुताबिक संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने संचार सचिव से कहा है कि वह इस पर एक नोट तैयार करें। इसके बाद ही फैसला लिया जाएगा। सरकार दो मुद्दों को केंद्र में रख कर फैसला करेगी। पहला यह कि अगर सार्वजनिक धन की हानि हुई है तो उसकी भरपाई होनी चाहिए। दूसरा संचार उद्योग की स्थिति को देखते हुए कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जाएगा, जिससे इसके विकास पर विपरीत असर पड़े। साफ है कि सरकार 2007-08 में लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों के कारोबार को बंद करने का कोई फैसला नहीं करने वाली। सरकारी सूत्रों का तर्क है कि वर्ष 2007-08 में लाइसेंस देने के लिए राजा ने वही रास्ता अख्तियार किया जिसे एनडीए सरकार के कार्यकाल में अपनाया गया था। वर्ष 2001 से वर्ष 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने विभिन्न दूरसंचार सर्किलों के लिए 51 लाइसेंस दिए थे। इसके लिए नीलामी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी। वर्ष 2004 के बाद भी यही स्थिति थी। इस दौरान दो बार स्पेक्ट्रम नीलामी की कोशिश की गई, लेकिन कंपनियां आगे नहीं आई। यह तर्क भी है कि इसकी वजह से ही देश में दूरसंचार घनत्व को सात फीसदी से बढ़ा कर 58 फीसदी करने में मदद मिली है। एंट्री फीस नहीं होने से कंपनियों की लागत कम हुई और टेलीफोन कॉल दरों में भी गिरावट हुई है।

जागरण की घोटाला ख़बरें 
कंपनियों को मनमाने तरीके से 2 जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस देने वाले तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा आखिर तक इन कंपनियों को बचाने की कोशिश करते रहे। कैग की जांच होने के बाद भी राजा की कारगुजारियों में फर्क नहीं आया। कंपनियों को सेवा शुरू करने के नियमों में ढील देकर राजा ने तोहफा दिया तो कंपनियों से इसका जुर्माना नहीं वसूल पाने के सवाल पर भी खुद पल्ला झाड़कर जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय पर डाल दी।
सूत्रों के मुताबिक कैग के कई सवाल तो ऐसे हैं जिन पर दूरसंचार विभाग ने जवाब ही रिपोर्ट तैयार होने के बाद दिया। सेवा शुरू करने में देरी करने वाली कंपनियों पर जुर्माना न लगाने को लेकर दूरसंचार विभाग का जवाब पिछले महीने यानी अक्टूबर 2010 में भेजा गया। जबकि तब तक कैग अपनी जांच पूरी कर चुका था। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 122 में से 85 लाइसेंस उन छह कंपनियों को दिए गए जो पहली बार दूरसंचार क्षेत्र में उतर रही थीं। लेकिन यह छह कंपनियां दूरसंचार विभाग के ढील देने के बावजूद 31 दिसंबर 2009 तक सेवाएं शुरू करने में असमर्थ रहीं। इसके बावजूद डॉट इन कंपनियों से 679 करोड़ रुपये का जुर्माना नहीं वसूल पाया।
राजा जानते थे कि कैग ने देरी से सेवा शुरू होने के मामले में जुर्माने के प्रावधान पर सवाल खड़े किए हैं। लिहाजा उन्होंने जुर्माने की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय के सिर डाल दी। डॉट ने पिछले महीने कैग को बताया कि जुर्माने की गणना का काम काफी जटिल है और यह काम वित्त मंत्रालय ही कर सकता है। लिहाजा इस मामले को वित्त मंत्रालय के पास भेजा जा रहा है। लेकिन यह जवाब भी डॉट ने कैग को तब भेजा जब उसकी रिपोर्ट तैयार हो चुकी थी। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक दूरसंचार विभाग ने पिछले महीने यानी अक्टूबर में ही कैग को यह जवाब भेजा है।
यही नहीं, जुलाई 2008 में लाइसेंस पाने वाली कुछ चहेती कंपनियों के आगे जब सेवा शुरू करने को लेकर दिक्कत आई तो राजा आगे आए और उन्होंने सेवा शुरू करने की शर्तो और नियम-कायदों में ढील देकर राहत दे दी। सूत्रों के मुताबिक लाइसेंस जारी होने के करीब सात महीने बाद फरवरी 2010 में दूरसंचार विभाग ने सेवा शुरू करने की शर्तो में संशोधन कर दिया। 2 जी स्पेक्ट्रम के नए लाइसेंस जुलाई 2008 में जारी हुए। संशोधन के जरिये नियमों में ढील देकर इन कंपनियों को चारों मेट्रो के अलावा अन्य शहरों में पहले चरण में केवल दस प्रतिशत हिस्से में टेलीकॉम सेवाएं शुरू करने की इजाजत दे दी गई।

स्पेक्ट्रम घोटाले में पीएमओ की बोलती बंद

नई दिल्ली 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में बुरी तरह उलझे प्रधानमंत्री कार्यालय की बोलती भी बंद सी हो गई है। दरअसल, जिस सीबीआई जांच का तर्क देकर प्रधानमंत्री कार्यालय ने ए.राजा के खिलाफ मुकदमे से इंकार किया था, वही सीबीआई तो खुद अदालत के कठघरे में खड़ी है और स्पेक्ट्रम घोटाले में जांच में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लताड़ खा रही है। अदालत ने राजा पर मुकदमे की इजाजत दे दी है, लेकिन राजा पर हाथ डालना राजनीतिक मुश्किलों का सबब बनेगा। गठबंधन राजनीति बेदाग छवि वाले प्रधानमंत्री से महंगी कीमत वसूल रही है। यही वजह है कि सरकार के लिए बेहद संवेदनशील हो चुके 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में पीएमओ कुछ भी बोलने से बच रहा है। इस बारे में पीएमओ के एक अधिकारी की टिप्पणी थी, हमें इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करनी है। जबकि कानून मंत्रालय न्यायालय की टिप्पणी को काफी तकनीकी बताकर बचता दिखा। सरकार के संकटमोचकों के सामने अदालत, विपक्ष और गठबंधन-इन तीनों को संभालने की चुनौती है। इनमें अदालत का मोर्चा ज्यादा कठिन है जहां गुरुवार को प्रधानमंत्री स्पेक्ट्रम घोटाले में 16 माह की चुप्पी का सबब बताएंगे। बीते एक साल में इस घोटाले पर उठे सवालों को लेकर प्रधानमंत्री का जवाब हमेशा सीबीआई जांच और मामला अदालत में होने की दलील पर आकर रुक जाता था। अब उसी अदालत ने प्रधानमंत्री की चुप्पी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार के संकटमोचक मामले में अदालत के तीखे रुख को देखकर कुछ ज्यादा ही बेचैन हैं। सीबीआई जांच के कारण राजा के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी न देने की प्रधानमंत्री कार्यालय की दलील सरकार पर उलटी पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी की 16 माह पुरानी याचिका पर यह दलील इस साल मार्च में दी गई थी, लेकिन मामला अब राजा को बचाने में सीबीआई के इस्तेमाल के विवाद की तरफ मुड़ रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत काम करने वाली सीबीआई ने इस मामले में याचिका के 11 माह बाद एफआईआर दर्ज की और वह भी अनजान लोगों के खिलाफ। जांच के आगे न बढ़ने पर सीबीआई ने 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जीएस संघवी और एके गांगुली की पीठ से लताड़ भी खाई थी। सीबीआई जांच के लिए और ज्यादा वक्त मांगने अदालत पहुंची थी। पीएमओ के लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा कि पिछले साल अक्टूबर में संचार भवन में छापा मारने वाली सीबीआई अब तक अनजान लोगों के खिलाफ ही जांच क्यों कर रही है? मंगलवार को मामले की सुनवाई में अदालत ने राजा के खिलाफ मुकदमे की अनुमति दे दी है। सरकारी वकील भी मुकदमा चलाने से सहमत हैं, लेकिन राजा पर हाथ डालने से गठबंधन की सेहत बिगड़ती है। इसलिए दाग धोने के लिए राजा पर मुकदमे चलाने की सुविधा भी प्रधानमंत्री को नहीं है। गत 12 नवंबर को अदालत में दाखिल दूरसंचार विभाग का हलफनामा एक अन्य पेंच है। इसमें पूरी प्रक्रिया को पाक साफ ठहराते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय की सहमति होने का दावा किया गया है। हालांकि हलफनामे के उलट सीएजी ने प्रधानमंत्री को पाक साफ बताया है, लेकिन उसकी रिपोर्ट ने राजा के मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी और निष्कि्रयता को और मुखर कर दिया है

संसद में अब पूरे विपक्ष के निशाने पर होंगे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
पीएम पर कोर्ट की टिप्पणी से सरकार सांसत में

नई दिल्ली बृहस्पतिवार को संसद में हमलावर विपक्ष के निशाने पर अब कोई मंत्री नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह होंगे। 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सुप्रीम कोर्ट की प्रधानमंत्री पर तल्ख टिप्पणियों के बाद समूचा विपक्ष इस मामले पर सबसे पहले प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण की मांग करेगा। भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने भी बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है और आजादी के साठ साल के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रधानमंत्री के बारे में ऐसी टिप्पणी की है। भ्रष्टाचार के तीनों मामलों की जेपीसी से जांच की मांग पर अड़े विपक्ष ने अब इस मांग के साथ प्रधानमंत्री को भी जोड़ दिया है। उसका कहना है कि जब प्रधानमंत्री पर सवाल खड़े हो रहे हैं तो संसद की संयुक्त समिति के अलावा और कोई प्रभावी जांच संभव ही नहीं है। संसद में गतिरोध खत्म कराने के लिए लोकसभा के नेता प्रणब मुखर्जी की मंगलवार को हुई सर्वदलीय बैठक बेनतीजा रहने के बाद सरकार अभी तक कोई नया फार्मूला नहीं खोज सकी है। ऐसे में विपक्ष के एक बार फिर संसद के दोनों सदनों में अपनी मांगों पर अड़ने और भारी हंगामा करने के पूरे आसार है। प्रधानमंत्री का मामला होने के कारण सरकार अब बेहद सतर्क हो गई है और वह फूंक-फूंककर अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है। वह नहीं चाहती है कि विपक्ष को अब कोई और मौका मिले। इधर विपक्ष भी सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह कमर कसे हुए है। विपक्ष के नेताओं के बीच अनौपचारिक संवाद तो बना हुआ है, लेकिन बृहस्पतिवार को संसद शुरू होने से पहले वे औपचारिक रूप से अपनी भावी रणनीति को अंतिम रूप देंगे। हालांकि इन दलों ने साफ कर दिया है कि पहले तो प्रधानमंत्री को सदन में सफाई देनी ही होगी। इसी बीच, भाजपा ने पूर्व संचार मंत्री अरुण शौरी के उस बयान को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, जिसमें उन्होंने जेपीसी के बजाए सीबीआई जांच को ज्यादा प्रभावी बताया था। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा कि शौरी ने आपराधिक जांच का मामला उठाया है, उसके लिए सीबीआई जांच जरूरी है, लेकिन बाकी पहलुओं के लिए जेपीसी से जांच जरूरी है

आखिर तक कंपनियों को बचाते रहे मंत्रीजी
कंपनियों को मनमाने तरीके से 2 जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस देने वाले तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा आखिर तक इन कंपनियों को बचाने की कोशिश करते रहे। कैग की जांच होने के बाद भी राजा की कारगुजारियों में फर्क नहीं आया। कंपनियों को सेवा शुरू करने के नियमों में ढील देकर राजा ने तोहफा दिया तो कंपनियों से इसका जुर्माना नहीं वसूल पाने के सवाल पर भी खुद पल्ला झाड़कर जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय पर डाल दी। सूत्रों के मुताबिक कैग के कई सवाल तो ऐसे हैं जिन पर दूरसंचार विभाग ने जवाब ही रिपोर्ट तैयार होने के बाद दिया। सेवा शुरू करने में देरी करने वाली कंपनियों पर जुर्माना न लगाने को लेकर दूरसंचार विभाग का जवाब पिछले महीने यानी अक्टूबर 2010 में भेजा गया। जबकि तब तक कैग अपनी जांच पूरी कर चुका था। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 122 में से 85 लाइसेंस उन छह कंपनियों को दिए गए जो पहली बार दूरसंचार क्षेत्र में उतर रही थीं। लेकिन यह छह कंपनियां दूरसंचार विभाग के ढील देने के बावजूद 31 दिसंबर 2009 तक सेवाएं शुरू करने में असमर्थ रहीं। इसके बावजूद डॉट इन कंपनियों से 679 करोड़ रुपये का जुर्माना नहीं वसूल पाया। राजा जानते थे कि कैग ने देरी से सेवा शुरू होने के मामले में जुर्माने के प्रावधान पर सवाल खड़े किए हैं। लिहाजा उन्होंने जुर्माने की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय के सिर डाल दी। डॉट ने पिछले महीने कैग को बताया कि जुर्माने की गणना का काम काफी जटिल है और यह काम वित्त मंत्रालय ही कर सकता है। लिहाजा इस मामले को वित्त मंत्रालय के पास भेजा जा रहा है, लेकिन यह जवाब भी डॉट ने कैग को तब भेजा जब उसकी रिपोर्ट तैयार हो चुकी थी। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक दूरसंचार विभाग ने पिछले महीने यानी अक्टूबर में ही कैग को यह जवाब भेजा है। यही नहीं, जुलाई 2008 में लाइसेंस पाने वाली कुछ चहेती कंपनियों के आगे जब सेवा शुरू करने को लेकर दिक्कत आई तो राजा आगे आए और उन्होंने सेवा शुरू करने की शर्तो और नियम-कायदों में ढील देकर राहत दे दी। सूत्रों के मुताबिक लाइसेंस जारी होने के करीब सात महीने बाद फरवरी 2010 में दूरसंचार विभाग ने सेवा शुरू करने की शर्तो में संशोधन कर दिया। 2 जी स्पेक्ट्रम के नए लाइसेंस जुलाई 2008 में जारी हुए। संशोधन के जरिए नियमों में ढील देकर इन कंपनियों को चारों मेट्रो के अलावा अन्य शहरों में पहले चरण में दस फीसदी हिस्से में टेलीकॉम सेवाएं शुरू करने की इजाजत दे दी गई.
कुछ ही घंटे में बदल दिए नियम
अपनी पसंदीदा कंपनियों को 2जी स्पेक्ट्रम बांटने में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने अपने ही नीतियों को कुछ ही घंटे में बदल दिया। सिर्फ नीतियां ही नहीं बदली बल्कि किन कंपनियों को लाइसेंस दिए जाएंगे इसका फैसला कुछ ही घंटों में कर लिया। पुराने नियमों को ताक पर रखते हुए इन कंपनियों को सिर्फ 45 मिनट में स्पेक्ट्रम हासिल करने का आशय पत्र भी जारी कर दिया। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट साफ तौर पर यह बताते हैं कि मंत्री पद पर बैठा कोई व्यक्ति किस तरह से अपने अधिकारों का बेजां इस्तेमाल करता है। संचार विभाग ने 10 जनवरी, 2008 को दोपहर में प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है कि दूरसंचार लाइसेंस देने के लिए पहले आओ पहले पाओ नीति तैयार की जा रही है। इसके आधार पर 25 सितंबर, 2007 तक जिन कंपनियों ने 2 जी स्पेक्ट्रम हासिल करने का लाइसेंस दिया है उन्हें इसका आवंटन किया जाएगा। कैग की ऑडिट से पता चला कि राजा ने खुद ही प्रेस विज्ञप्ति में बदलाव किया था। एक ही दिन आवेदन करने वाली कंपनियों को लेकर नियमों को इस तरह से बदला गया कि राजा को अपने मनमुताबिक फैसला लेने में सहूलियत हो। संचार विभाग अचानक दोपहर (2.45 बजे) फिर यह प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है कि 232 आवेदकों में से 121 आवेदक सही पाए गए हैं। यही नहीं सभी सफल आवेदकों को 3.30 बजे तक डॉट मुख्यालय संचार भवन उपस्थित होने को कहा जाता है। वहां इन आवेदकों को 2 जी स्पेक्ट्रम हासिल होने का आशय पत्र जारी कर दिया जाता है। 120 आवेदकों ने तो इसके कुछ ही घंटे बाद दूरसंचार विभाग को यह सूचना दे देते हैं कि उन्हें उसकी सारी शर्ते मंजूर हैं। कैग ने सवाल उठाया है कि राजा ने पहले आओ पहले पाओ नीति का अपने तरीके से परिभाषित किया। पहले आओ-पहले पाओ नीति को 30 दिनों के भीतर बनाना था लेकिन उसमें 550 दिन का समय लिया गया, लेकिन कुछ ही घंटे में नियम भी बदल दिए गए और कंपनियों को पौने घंटे में ही फायदा पहुंचा दिया गया। कैग ने बताया है कि कंपनियों को पहले से ही मालूम था कि उनके पक्ष में फैसला होना है। यही वजह है कि 13 कंपनियों के पास काफी पहले से बना हुआ डिमांड ड्राफ्ट तैयार था। उन्हें जानकारी पहले ही दी गई थी। सब कुछ कंपनियों और राजा की सहमति से हुआ है।

नियम विरुद्ध लाइसेंस बेच की मोटी कमाई, स्पेक्ट्रम की कीमत पता लगाने के तरीकों को किया नजरअंदाज
राजा के राज में रहा कंपनियों का साम्राज्य
नई दिल्ली पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के राज में टेलीकॉम कंपनियों ने जमकर मनमानी की। मनमानी इस हद तक कि लाइसेंस लेने के लिए नियम ही नहीं टूटे बल्कि कंपनियों ने लाइसेंस बेचकर मोटी कमाई भी की। सस्ते दामों में 2 जी स्पेक्ट्रम हासिल करने की होड़ में कुछ कंपनियों का तो गठन तक स्पेक्ट्रम नीलामी प्रक्रिया शुरू होने से ऐन पहले हुआ। 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर संसद में पेश की गई कैग की रिपोर्ट के तथ्य यही कहते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2008 में जो 122 नए लाइसेंस जारी हुए उनमें नियमों का पालन नहीं हुआ। कैग ने पूरे मामले की जांच में ऐसी अनियमितताएं पकड़ी हैं जिसके चलते देश के खजाने को भारी चूना लगा। जिस कीमत पर स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए उसकी वास्तविक कीमत का पता लगाने के तरीके को ही दूरसंचार विभाग ने नजरअंदाज कर दिया। यही नहीं छह आपरेटर ऐसे पाए गए जिन्होंने लाइसेंस लेने के बावजूद तय समय में अपनी सेवाएं ही शुरू नहीं कीं। मामला सिर्फ नजरअंदाज करने का ही नहीं है। कंपनियों को लाइसेंस जारी करने के मामले में भी नियम टूटे। कुल 122 लाइसेंस में 72 मामले ऐसे थे जो आवेदन की बुनियादी शर्तो को ही पूरा नहीं करते थे। इसके बावजूद आवंटन से ऐन पहले इन कंपनियों ने खुद को दूरसंचार विभाग की शर्तो के अनुकूल बनाया और लाइसेंस पाने में सफल रहीं। कंपनियों ने सस्ते में लाइसेंस लेकर उनसे मोटी कमाई भी की। कैग ने ऐसी छह कंपनियों का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है। इनमें स्वान टेलीकॉम, एस टेल, यूनिटेक, टाटा टेली सर्विसेज, टाटा टेली महाराष्ट्र और सिस्टेमा श्याम शामिल हैं। इनमें से तीन स्वान, एस टेल और यूनिटेक दूरसंचार क्षेत्र में उतरने वाली नई कंपनियां थीं। लेकिन सभी कंपनियों ने लाइसेंस पाने के बाद अपनी इक्विटी का कुछ हिस्सा काफी ऊंचे दामों में विदेशी निवेशकों को बेचकर मोटी कमाई की। इसी बिना पर कैग ने सवाल उठाया है कि स्पेक्ट्रम पाने के बाद अगर इन कंपनियों को ऊंचा निवेश मिल सकता है तो फिर स्पेक्ट्रम के दाम इतने कम क्यों रखे गए? इस मामले में कैग ने यूनिटेक का उदाहरण दिया है। यूनिटेक को 22 सर्किल के लिए लाइसेंस मिला और उसने प्रत्येक सर्किल के लिए 1658 करोड़ रुपये की लाइसेंस फीस दी। लेकिन उसने नार्वे की टेलीनॉर को अपनी 67.25 प्रतिशत इक्विटी 6120 करोड़ रुपये में बेची। यानी टेलीनॉर ने कंपनी के पास उपलब्ध स्पेक्ट्रम की यह कीमत लगाई। कैग का मानना है कि इस लिहाज से पूरे देश के लिए लाइसेंस जारी करने की फीस 7758 करोड़ रुपये से 9100 करोड़ रुपये के बीच तय होनी चाहिए थी। यानी जिन 122 लाइसेंस के एवज में सरकार को 12386 करोड़ रुपये मिले वह राशि दरअसल 58000 करोड़ रुपये से लेकर 68000 करोड़ रुपये हो सकती थी।

विपक्ष को रास नहीं आई प्रणब की दावत
नई दिल्ली भ्रष्टाचार के मामलों पर संसद में चल रहे टकराव को टालने की सरकार की कोशिशें तो परवान चढ़ी ही नहीं, उलटे सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां उसके लिए नई मुसीबतों का सबब बन गई हैं। विपदाओं के समय सरकार के संकटमोचक बन कर उभरते रहे प्रणब मुखर्जी की दोपहर के भोजन की दावत भी विपक्ष को रास नहीं आई और उसने साफ कर दिया कि जेपीसी से जांच से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। सरकार की कोशिशों के सामने भाजपा व सपा तो टस से मस नहीं हुए, लेकिन कुछ दलों ने सरकार से कहा कि अगर उसके पास कोई और विकल्प है तो वह उसे लेकर आए। संसद में 2 जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी व राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले के आरोपों को लेकर जेपीसी की मांग को लेकर चल रहे गतिरोध को तोड़ने के लिए लोकसभा के नेता प्रणब मुखर्जी द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक सारी कोशिशों के बावजूद बेनतीजा रही। बैठक के बाद मुखर्जी ने कहा कि वह सभी दलों की राय को प्रधानमंत्री तक पहुंचाएंगे और बृहस्पतिवार तक सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करेगी। बैठक में जाने के पहले मुखर्जी ने भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी व दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं सुषमा स्वराज व अरुण जेटली के साथ चर्चा कर रास्ता निकालने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद बैठक में भाजपा व सपा ने दो टूक कहा कि जेपीसी के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। वामदलों ने भी जेपीसी की मांग की, लेकिन कहा कि अगर सरकार के पास और कोई विकल्प है तो उसे लेकर आए। बीजद व राकांपा ने जरूर सरकार का साथ देते हुए कहा कि जेपीसी की जगह कोई और जांच भी सरकार करा सकती है। भाजपा ने इतना जरूर स्पष्ट किया कि तीनों मामलों की एक ही जेपीसी से या फिर अलग-अलग जेपीसी से जांच करा सकती है। इसके पहले भाजपा संसदीय दल की बैठक में आडवाणी ने कहा कि भाजपा जेपीसी जांच की मांग से पीछे नहीं हटेगी और भ्रष्टाचार के मामलों को वह अंजाम तक पहुंचाएगी। इस संकट से निकलने में असफल रही सरकार को शाम को सुप्रीम कोर्ट से और भी ज्यादा करारा झटका लगा। सर्वोच्च अदालत ने 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका पर उंगली उठा कर भ्रष्टाचार के मामले पर संसद में हंगामा कर रहे विपक्ष के हाथ नया गोला बारूद थमा दिया। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने पूरे मामले पर प्रधानमंत्री से सफाई से मांगने के साथ आरोप लगाया है कि क्या वे इतने असहाय हो गए हैं कि उनकी नाक के नीचे घोटाला होता रहा और वह चुप बैठे रहे? भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रधानमंत्री को देश को बताना होगा कि वे कौन सी राजनीतिक मजबूरियां थी कि उनकी नाक के नीचे घोटाला होता रहा और वे चुप्पी साधे रहे? क्या देश का प्रधानमंत्री इतना असहाय व निसहाय हो गया है कि उसका एक मंत्री उनके दिशानिर्देशों को उल्लंघन करता रहा और वे कुछ नहीं कर सके? उन्होंने कहा कि देश जानना चाहता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है और यह पैसा कहां गया?

जीपीसी से बचने की जुगत में कांग्रेस
नई दिल्ली टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में घिरे ए.राजा का इस्तीफा भी मनमोहन सरकार की मुश्किलें कम नहीं कर पाया। एकजुट विपक्ष ने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार के सभी मुद्दों पर वह संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने से कम पर तैयार नहीं है। ऐसे में मंगलवार को फिर से सरकार को विपक्ष के उग्र तेवर का सामना करना पड़ेगा। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं कि विपक्ष जल्द सरकार को राहत देने के पक्ष में नहीं है। वहीं, सरकार और कांग्रेस जेपीसी से बचने की जुगत तलाश रही है। मंगलवार दोपहर खाने पर सभी दलों के नेताओं के साथ बैठकर रास्ता निकालने की कोशिश करेगी। लोकसभा में मतदान के प्रावधान वाले नियम 184 के तहत चर्चा कराने का प्रस्ताव भी दिया जा सकता है। आदर्श सोसाइटी और राष्ट्रमंडल धांधली में अशोक चव्हाण और सुरेश कलमाड़ी पर हुई कार्रवाई की तर्ज पर ही राजा का इस्तीफा लेकर मामले को शांत करने की कोशिश नाकाम रही। सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू होते ही दोनों सदनों में विपक्ष ने साफ कर दिया कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं। जेपीसी की मांग के नारों और शोरशराबे के बीच कुछ दस्तावेज पेश करने के अलावा कोई कामकाज नहीं हो सका। यह लगातार तीसरा दिन था जब संसद में कामकाज नहीं हो सका। भ्रष्टाचार को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच सरकार नहीं चाहती कि यह शोर लंबा खिंचे। लिहाजा, अब रास्ता निकालने की कवायद शुरू हुई है। कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि विपक्ष सत्तारूढ़ कांग्रेस को यह संदेश भेज रहा है कि वह लोकसभा में नियम 184 के तहत चर्चा कराना चाहता है। सरकार के संकटमोचक और लोकसभा में नेता प्रणव मुखर्जी मंगलवार दोपहर खाने की मेज पर इसे सुलझाने की कोशिश करेंगे। भाजपा और वामदलों के नेताओं समेत विभिन्न दलों के दो दर्जन नेताओं को आमंत्रित किया गया है। कोशिश होगी कि चर्चा के लिए विपक्ष को तैयार कर सदन की कार्यवाही को सुचारू किया जा सके क्योंकि दोनों ही सदनों में बीते एक सप्ताह से कोई भी कामकाज नहीं हो पा रहा है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा, इस बैठक का मकसद गतिरोध को आपसी सलाह-मशविरे के जरिए खत्म करना है। हालांकि, यह बहुत आसान नहीं होगा। संकेत हैं कि विपक्षी दल और खासकर भाजपा अपनी पार्टी बैठक में चर्चा की बात कहकर इसे टालने की कोशिश करेगी। प्रणव जेपीसी की मांग ठुकरा चुके हैं। सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद उन्होंने भाजपा पर आक्रामक होते हुए कहा-अपने छह साल के कार्यकाल में भाजपा ने तहलका समेत कितने मुद्दों पर जेपीसी गठित की थी। संसद में पेश होने के बाद सीएजी की रिपोर्ट संसद की लोक लेखा समिति में जाएगी और वहां इसकी जांच हो सकती है। लोकलेखा समिति के अध्यक्ष व भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने प्रणव से असहमति जताते हुए कहा कि समिति सिर्फ सीएजी की रिपोर्ट पर गौर करेगी और उस पर सदन में चर्चा भी नहीं होगी। विपक्ष भ्रष्टाचार के इस मुद्दे की तह तक जाना चाहता है। लिहाजा जेपीसी से कम पर वह राजी नहीं। खाने की मेज पर दोनों पक्षों की ओर से जो भी तर्क रखे जाएं, लेकिन यह तय है कि सुबह संसद में विपक्ष और सरकार आमने सामने होगी।


स्पेक्ट्रम घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर निकला
 संचार मंत्री राजा के जाते ही टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है। अब घोटाले में शामिल कंपनियों पर गाज गिरने की बारी है। पहला निशाना वह पांच कंपनियां हो सकती हैं जिन्होंने टूजी लाइसेंस के लिए आवेदन करने के साथ ही घोटाले की बिसात बिछा ली थी। दूरसंचार विभाग ने भी लाइसेंस आवंटन के नियमों को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए पांच ऐसी कंपनियों को कुल 72 लाइसेंस दे दिए जिन्होंने आवेदन की बुनियादी शर्ते भी पूरी नहीं की थीं। इन्हीं कंपनियों ने बाद में स्पेक्ट्रम के खजाने को बेचकर मोटी कमाई की। इन कंपनियों के साथ दूरसंचार विभाग के अधिकारी भी लपेट में आएंगे, जिन्होंने दस्तावेजों को प्रमाणित किए बगैर लाइसेंस जारी कर दिए। इनमें उपरोक्त 72 लाइसेंस भी थे। सीएजी की रिपोर्ट कल सदन में पेश की जाएगी। इसके साथ ही जांच एजेंसियां कंपनियों पर शिकंजा कसने की कार्रवाई शुरु कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक सीएजी ने अपनी रिपोर्ट यह साफ कहा है कि दूरसंचार विभाग ने जो कुल 120 लाइसेंस जारी किए थे उनमें 72 लाइसेंस लेने वाली पांच कंपनियों ने दूरसंचार कारोबार में शामिल होने या अधिकृत पूंजी की शर्तो का सीधा उल्लंघन किया, लेकिन फिर भी इन्हें लाइसेंस दे दिए गए। सीएजी ने यह सिफारिश भी की है कि इनके लाइसेंस रद कर दिए जाने चाहिए। अगर ऐसा होता है तो सरकार इनकी 3375 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी जब्त कर लेगी। सूत्रों के मुताबिक इन आवंटनों की फाइलें जल्द ही खुलने वाली हैं। जिनके बाद यूनीटेक ग्रुप ऑफ कंपनीज, लूप टेलीकॉम, डाटाकॉम सॉल्यूशंस, अलायंज इन्फ्राटेक, डाटाकॉम सॉल्यूशंस और एस टेल पर जांच का फंदा पड़ेगा। लाइसेंस का आवेदन करने वाली कंपनियों को पास दूरसंचार कारोबार में सक्रिय होने की शर्त थी इसके अलावा उनके लिए कम से कम 138 करोड़ रुपये की चुकता इक्विटी पूंजी की शर्त भी तय की गई थी। कंपनियों ने खेल इन्हीं दोनों में शर्तो में किया। कंपनियों को लाइसेंस जुलाई 2008 में मिले और इससे ठीक पहले मई 2008 में इन्होंने अपने गठन व पूंजी का ढांचा बदला। सूत्रों के मुताबिक यूनीटेक, अलायंज और लूप टेलीकॉम ने लाइसेंस मिलने से ठीक पहले अपने मेमोरेंडम आफ एसोसिएशन बदल दिए और मूल कारोबार दूरसंचार को जोड़ दिया जबकि लूप के अलावा डॉटाकॉम व एस टेल ने लाइसेंस की अर्जी देने के बाद चुकता पूंजी बढ़ाई दी। हैरत की बात यह है कि कंपनियां ने यह सारे बदलाव लाइसेंस आवेदनों की जांच की अंतिम तारीख तक नहीं कर पाई थी। नतीजतन इनके आवेदन नकारे जाने चाहिए थे लेकिन राजा के मंत्रालय ने अपने ही नियमों को ताख पर रखकर इनके लाइसेंस दे दिये। बतातें चलें कि दूरसंचार विभाग के पास नवंबर 2007 तक कुल 575 आवेदन आए थे जिनमें पहले आओ पहले पाओ के आधार पर 232 आवेदन चुने गए और इनमें 120 को जनवरी 2008 में लाइसेंस दे दिए गए।


दबाव में राजा ने कुर्सी छोड़ी
विपक्ष के बढ़ते दबाव और प्रधानमंत्री के सख्त रुख के बाद आखिरकार टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में घिरे दूरसंचार मंत्री ए.राजा ने रविवार देर रात इस्तीफा दे दिया। राजा ने कहा, सरकार को उलझन से बचाने और संसद में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए मेरे नेता (एम.करुणानिधि) ने त्याग पत्र देने की सलाह दी। नई दिल्ली आने से पहले राजा ने पिछले 24 घंटे में चेन्नई में करुणानिधि से दो बार भेंट की। उसके बाद वह सीधे प्रधानमंत्री आवास 7 रेसकोर्स रोड गए और उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया। इससे पहले यह साफ हो गया था कि मनमोहन सिंह अब संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए. राजा को मंत्रिमंडल में कतई बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। लेकिन संकट गठबंधन धर्म को लेकर था। राजा के इस्तीफे पर कांग्रेस करुणानिधि से ही मुहर लगवाना चाहती थी। बेशक राजा अपने ऊपर हर तरफ से उठ रही अंगुली के इशारे को नकारने का हौसला दिखा रहे थे लेकिन प्रधानमंत्री के दबाव के आगे द्रमुक सुप्रीमो को भी हथियार डालने पड़े। राजा को मंत्रिमंडल में अब न रखने का मन बना चुकने के बावजूद कांग्रेस द्रमुक के साथ संबंध बिगाड़ने की हद तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। इस मसले पर रविवार को प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के साथ संसद में मंत्रणा भी हुई। सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री राजा को लेकर सरकार और पार्टी की हो रही फजीहत के कारण उन्हें आगे ढोने के कतई इच्छुक नहीं थे। वह मान रहे थे कि तकनीकी तौर पर भले ही राजा पर सीधा शिकंजा न कसा जा सके, लेकिन गड़बड़ी हुई है और अब सवाल सरकार की साख का है। साख के प्रश्न ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वह करुणानिधि को साफ कर दें कि राजा को लेकर चलने की स्थिति में सरकार कतई नहीं है। हालांकि द्रमुक की तरफ से तर्क दिया जा रहा था कि राजा को हटाने का मतलब उन्हें दोषी करार देना होगा। इसका राज्य की राजनीति में जयललिता फायदा उठा लेंगी। यही कारण है कि द्रमुक के साथ गठबंधन को बेजोड़ बताते हुए कांग्रेस ने द्रमुक सुप्रीमो को सीधा संदेश भेजा कि इस मसले पर राजा के हटने के अलावा और कोई रास्ता बचता नहीं है। इतना जरूर है कि दूरसंचार मंत्रालय अभी भी द्रमुक के कोटे में रहेगा। कांग्रेस को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं है। प्रधानमंत्री से मिले संकेत का ही असर था कि तमिलनाडु के कानून मंत्री दुरई मुरुगन आए तो थे दिल्ली माहौल का जायजा लेने लेकिन अचानक वापस चेन्नई लौट गए.


स्पेक्ट्रम घोटाले में लेन-देन के सबूतों के करीब सीबीआई
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर ए. राजा भले ही टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन को पाक-साफ बताने की कोशिश कर रहे हों, पर जांच एजेंसियां आवंटन के सिलसिले में करोड़ों रुपये के लेन-देन के सबूत हासिल के करीब पहुंच गई हैं। जांच से जुड़े सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि पैसे का सारा लेन-देन देश के बाहर हुआ है, जिसे हवाला या फर्जी कंपनियों की आड़ में देश में वापस लाया जा चुका है। इस सिलसिले में चेन्नई के कुछ चार्टर एकाउंटेंट और हवाला कारोबारी जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं। सीबीआई अधिकारी ने बताया कि उन्हें स्पेक्ट्रम आवंटन के सिलसिले में निजी कंपनियों द्वारा रिश्वत दिए जाने के संकेत मिल गए हैं। इस संबंध में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में भी बता दिया जाएगा। असली चुनौती यह साबित करने की है कि करोड़ों की रिश्वत स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े अफसरों या उनके रिश्तेदारों तक पहुंची है। उनके अनुसार पैसे के विदेश से भारत तक पैसे के इस लेन-देन की पूरी श्रृंखला है, जिसमें बेनामी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया है। कुछ हवाला कारोबारियों ने भी इसमें मदद की है। सीबीआई के मुताबिक, लेन-देन की पूरी श्रृंखला की पहचान कर ली गई है और अंतिम लाभार्थी के बारे में भी पूरी जानकारी जुटा ली गई है। सबूत जुटाने के सिलसिले में मारिशस जैसे कुछ देशों में अनुरोध पत्र (लेटर-रेगोटरी-एलआर) भेजा जायेगा। वहीं चेन्नई के कुछ चार्टर्ड एकाउंटेंट और हवाला कारोबारियों पर भी सीबीआई और ईडी की नजर है। इनमें से कुछ से पूछताछ भी का जा चुकी है। सीबीआई के एक अधिकारी ने कहा, जांच बहुत ही नाजुक दौर में पहुंच गई है। जहां पैसे के लेन-देन के अंतिम लाभार्थी के खिलाफ सबूत कभी भी हाथ लग सकते हैं। इसीलिए खास सतर्कता बरती जा रही है। यदि जांच से जुड़े इन तथ्यों की जानकारी लेन-देन में शामिल लोगों को लग गई तो सबूत मिटाने और जांच को पटरी से उतारने की कोशिश कर सकते हैं। यही कारण है कि दूरसंचार मंत्रालय और सीबीआई के वकीलों की संयुक्त बैठक का जांच एजेंसी के अधिकारियों ने बहिष्कार कर दिया।


गले की फांस बनेगा राजा का हलफनामा
 हर तरफ से घिरे दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन जाते-जाते उन्होंने अपने कार्यो को सही ठहराने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भी लपेट लिया है। दूरसंचार विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में पेश हलफनामे में साफ कहा है कि पीएमओ को पत्र लिखकर हर फैसले की जानकारी दी गई थी। इस फैसले पर वित्त मंत्रालय की भी आपत्तियां समाप्त हो गई थीं। राजा इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने मामले को विचार के लिए अधिकार प्राप्त मंत्री समूह (ईजीओएम) के पास भेजने की कानून मंत्रालय की राय भी खारिज कर दी थी। हलफनामा स्पेक्ट्रम आवंटन फैसले में पूरी सरकार की भागीदारी की कोर्ट के सामने पुष्टि करता है। सरकार के लिए इस हलफनामे को खारिज करना मुश्किल होगा। इसमें सरकार ने पूरे फैसले को नीतिगत रूप से सही ठहराया है। हलफनामे पर पीएमओ या कानून मंत्रालय की सहमति थी या नहीं, यह एक रहस्य है। लेकिन, इसमें प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रालयों के बीच हुए पत्राचार का तिथिवार ब्योरा देकर साबित करने की कोशिश की गई है कि आवंटन प्रधानमंत्री की सहमति और जानकारी में हुआ था। इसमें प्रधानमंत्री द्वारा 2 नवंबर 2007 को संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भेजे गए पत्र और उसी दिन राजा द्वारा उन्हें भेजे गए जवाबी पत्र के साथ 6 नवंबर 2007 को दूरसंचार विभाग के सचिव द्वारा प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव को लिखे गए पत्रों का भी हवाला दिया गया है। उनमें पीएमओ को यूनीफाइड एक्सेस सर्विस (यूएएस) लाइसेंस देने के संबंध में विभाग के निर्णय और अपनाई जा रही नीति व प्रक्रिया की जानकारी दी गई थी। स्पेक्ट्रम आवंटन में प्रधानमंत्री से मतभेद नकारते हुए कहा गया है कि 26 दिसंबर 2007 को राजा ने प्रधानमंत्री को और एक पत्र लिखा था। उसमें बिना किसी देरी के मौजूदा नीति के मुताबिक फैसला लागू करने का प्रस्ताव करने की सूचना दी गई थी। हलफनामे के साथ इन पत्रों की प्रतियां संलग्न की गई हैं, ऐसे में सरकार का अनभिज्ञता जताना या पीछे हटना मुश्किल होगा। वित्त मंत्रालय से भी मतभेद नकारते हुए विभाग ने कहा है कि 27 नवंबर 2007 को वित्त सचिव ने एंट्री फीस को लेकर कुछ आपत्तियां उठाई थीं, लेकिन दूरसंचार सचिव ने दो दिन बाद 29 नवंबर को ही उसका जवाब दे दिया था। इसके बाद कोई सवाल नहीं उठे। इस तरह विभाग ने वित्त मंत्रालय को भी अपने साथ दिखाने की कोशिश की है। आवंटन की जल्दबाजी में राजा ने कानून मंत्रालय की राय भी नहीं मानी। मंत्रालय की राय थी कि मामले को विचार के लिए ईजीओएम को भेज दिया जाए। राजा ने दलील दी है कि कानून मंत्रालय की राय टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन नीति के बारे में नहीं थी, बल्कि सिर्फ आवंटन प्रक्रिया के बारे में थी। लिहाजा, ईजीओएम गठित करना जरूरी नहीं था।


द्रमुक ने कांग्रेस को धमकाया
नई दिल्ली दूरसंचार मंत्री ए.राजा को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने के लिए अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता के कूदने के बाद तमिलनाडु की राजनीति गरमा गई है। जयललिता के बिना समर्थन प्रस्ताव के बाद राज्य में कांग्रेस के बढ़े हौसलों को जमीन पर लाने के लिए द्रमुक ने भी धमकी की राजनीति शुरू कर दी है। तमिलनाडु में द्रमुक के नेताओं ने बैठक कर ऐलान कर दिया है कि राजा को कैबिनेट से हटाया गया तो द्रमुक केंद्र से समर्थन तो वापस नहीं लेगी, लेकिन उसके सभी मंत्री इस्तीफा दे देंगे। द्रमुक का यह दांव राजा को बचाने से ज्यादा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीके. वासन की एआईडीएमके के साथ बन रही नई केमिस्ट्री को तोड़ने की कोशिश है। वासन लगातार इस बात का दबाव बना रहे हैं कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को भी राज्य की सत्ता में भागीदारी मिलनी चाहिए, जैसे कि द्रमुक ने केंद्र में ले रखी है। जयललिता ने कांग्रेस को यह प्रस्ताव भी दे दिया है कि राज्य में साथ लड़ने पर वह उसके मंत्री भी कैबिनेट में शामिल करेगी। इसके बाद से कांग्रेस की स्थानीय इकाई लगातार राज्य में द्रमुक के भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठा रही है। तथ्य भी यह है कि तमिलनाडु के 10 फीसदी वोटों के सहारे कांग्रेस राज्य में किंगमेकर की हैसियत में है। वहीं, करुणानिधि के परिवार और पार्टी में चल रही अंदरूनी कलह के चलते द्रमुक कठिन दौर से गुजर रही है। इसीलिए, द्रमुक अगले विस चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस से सीधा मोर्चा तो खोल नहीं सकती, लेकिन उसने दबाव बनाने के लिए पूरी कैबिनेट के इस्तीफे का दांव खेलकर कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश की है।

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